सधार्मिक भक्ति के संबंध में

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जैन जीवन शैली के तत्वों में समाया एक तत्व है साधर्मिक भक्ति । एक सुश्रावक का कर्तव्य होता है सधार्मिक भक्ति करना पर किस की भक्ति करना वो भी समझाना बहुत जरुरी है ।

एक धर्म में आस्था रखने वाले व्यक्ति परस्पर साधर्मिक कहलाते है – साधर्मिक यानी समान धर्म को मानने वाला । सिर्फ इतना ही नहीं नमस्कार महामंत्र का जाप करने वालो को साधर्मिक मान जाये चाहे वे किसी भी पंथ के हो । इस भावना से ही जैन धर्म को व्यापक बनाया जा सकता है ।

सधार्मिक भक्ति किस लिए और कैसे – साधर्मिकों में भाई-चारे का व्यवहार होता है । भाई चारे का सहज अर्थ है एक दूजे के सुख – दुःख में सहभागिता । क्यों की व्यक्ति सुख बाँटकर गोरव अनुभव करता है, वही दुःख बाँटकर हल्केपन का अहसास होता है अकेलेपन में दुःख दिखना असहनीय होता है उतना ही सुख भी असहनीय बन जाता है । इस लिए एक सक्षम व्यक्ति को अपने सधार्मिक भाई के प्रति उत्तरदायि होना चाहिए ।

सक्षम लोगों को दो उत्तरदायित्व सँभालने है । प्रथम धार्मिक आस्था व द्वितीय सामजिक उत्तरदायित्व । यदि कोई व्यक्ति शिक्षा, चिकित्सा व भोजन इत्यादि की बुनयादी न्यूनतम आवश्यकताओ को पूरा करने में असमर्थ है तो हमें उसके प्रति सधार्मिक भक्ति के दायित्व का अहसास होना भी जरुरी है ।

यदि सक्षम सधार्मिक व्यक्ति अपनी सक्षमता का उपयोग इस तरह करेगा तो समाज परिपक्व, गतिशील व प्रगतिशील बनेगा । कहा जाता है “अपने सधार्मिक के दुःख को हल्का करना तो अपने स्वयं के दुःख को हल्का करने समान है ।” आज के समाया में समाज में जो दो वर्गों की खाई फ़ैल रही है उसे भरने का प्रयास हम सभी को करना होगा हमें हमारे कमजोर सधार्मिक भाईयों के जीवन को सुधरने का सच्चा प्रयास करना चाहिए यही सच्ची सधार्मिक भक्ति है ।

नई सोच की जरुरत : आजकल धार्मिक आयोजनों में नवकारसी का चढ़ावा लेकर भव्य सधार्मिक भक्ति की जाती है । इसका कोई विरोध नहीं, पर फिर भी कीर्ति हेतु यह किया भी जाता है । पर वास्तविक सधार्मिक भक्ति जरूरतमंद साधर्मिकों की जरूरतों को पूरा कर उनकी भक्ति करना है । इसे आयोजन से कुछ राशी का उपयोग उन जरुरतमंद साधर्मिको की भक्ति हेतु भी किया जाएँ ।

समाज में इस तरह की व्यवस्था भी की जा सकती है इससे एक फंड बनाकर उसका उपयोग सधार्मिक बंधुवो के स्तर को सुधरने के लिए किया जाये । कुछ इसी ही बाते सुनने के मिली है संकित ग्रुप द्वारा इस तरह की व्यवस्था की गई है जिससे बिना व्याज के सधार्मिक व्यक्ति को धनराशी राशी प्राप्त हो सकती है ।

शास्त्रों में कहा गया है की भले कितने भी धर्मस्थान सोने-चांदी के बना लो, पर एक सधार्मिक की भक्ति का पूण्य उससे भी श्रेष्ठ है । इससे स्पष्ट है की सधार्मिक भक्ति का कितना महत्त्व है । सधार्मिक धर्म में स्थिर होगें, तनाव मुक्त होगें, तभी तो शासन 21000 वर्ष तक आन बान और शान से चलेगा ।

जिनआज्ञा विरुद्ध कुछ लिखा गया हो तस्स मिच्छामी दुक्कड़म

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