जय जिनेन्द्र, आज के इस भौतिक युग में धर्म के संस्कारों का लोप होता जा रहा है। भौतिक पढ़ाई हेतु कई विद्यालय मौजूद हैं, उनकी संख्या में प्रतिदिन वृद्धि भी होती जा रही है। बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर जीवन में आगे बढ़ने के अवसर भी पा रहे हैं, पर क्या शांत, निर्मल, स्वच्छ, सुंदर जीवन, तनाव रहित जीवन का भी ज्ञान पाया ?

अपने धर्म के मूलभूत सिद्धांतों की जानकारी बिना कई बच्चे धर्म से विमुख भी होते जा रहे हैं। धर्मनिष्ठ संस्कारों से आत्मा को पल्लवित किए बिना धर्ममय जीवन संभव नहीं।

‘सम्यगज्ञान’ की ज्योति को विकसाने में संस्कार शाला का विशेष योगदान होता है। धार्मिक शिक्षा के बिना संस्कारों का शुद्धिकरण संभव नहीं। ज्ञान की प्याऊ जैसी संस्कार शाला, बच्चों को पवित्र पद पर स्थापित करती है।

जिस शक्कर में मिठास नहीं, वह शक्कर नहीं,
जिस पुष्प में सुवास नहीं, वह पुष्प नहीं,
जिस औषध में गुण नहीं, वह औषधि नहीं,
और जिस मानव में सद्ज्ञान नहीं, वह मानव नहीं।

ऐसे ही सदज्ञान-सम्यकज्ञान को प्राप्त कराती है “संस्कारशाला”

सम्यगज्ञान की धारा से आप्लावित व्यक्ति अपने घर को प्रेम मंदिर बनाता है। जीवन जीने की कला सिखाती है “संस्कार शाला – धार्मिक पाठशाला”

विद्यालय व पाठशाला ज्ञान के केंद्र होते हैं, जीवन निर्माण की प्रयोगशाला होते है और समाज व राष्ट्र की दूरी होते हैं। मानव का प्रथम निर्माण “माँ” के हाथों होता है और दूसरा निर्माण विद्यालयों व पाठशालाओं में शिक्षक द्वारा होता है। हमारे विद्या केंद्र में, संस्कार शालाओं में, धार्मिक पाठशालाओं में सुसंस्कार, धर्म के मूल सिद्धांत, नैतिक जीवन व शिष्टाचार की शिक्षा मिलती है जिससे बच्चे का जीवन पथ सुगम सहज बनता है। धर्म के साथ ही संस्कृति का शिक्षण, सेवा साधना का प्रशिक्षण भी मिलता है।

बाल्य वय में जो बच्चे यह शिक्षण प्राप्त करते हैं वे उद्योग हो या व्यापार, धर्म समाज व शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति प्राप्त करते हैं। अपने सुसंस्कारों द्वारा परिवार, धर्म एवं समाज की गरिमा बढ़ाते हैं।

संस्कारशाला तो एक फैक्ट्री है जो सच्चे, सदाचारी और सुसंस्कारी व्यक्तित्व का निर्माण कर महत्वपूर्ण योगदान देती है।

ऐसी पाठशालाओं में विद्यार्थियों का आकर्षण, आगमन एवं अध्ययन किस प्रकार वृध्धिगत हो इस का प्रयत्न करना चाहिए। कोरे क्रियाकांड नहीं वरन मानव धर्म एवं सत्कर्म करने की शिक्षा प्रदान की जाए। भावी पीढ़ी जैन धर्म के मौलिक तत्व ज्ञान से परिचित हो, प्रभावित हो इस तरह सरलता से हेतु, तर्क व दृष्टांत के साथ तत्वज्ञान सिखाया जाए।

मन वचन काया की एकाग्रता से ध्यान, इसका पढ़ने वाला स्वयं पर सार्थक प्रभाव, कर्म शुद्धि इत्यादि की शिक्षा सुगमता से प्रदान की जाए ताकि विद्यार्थी के जीवन में समता व समाधि की वृद्धि हो।

सम्यगज्ञान तो वह दिवाकर है जो मोह के घने अंधकार को दूर कर आत्मा को अपूर्व आभा से प्रकाशित कर देता है, ज्ञान तो वह सुधाकर है जो आत्मा की अनमोल निधि का, आत्मा के अनंत सौंदर्य का साक्षात्कार कराता है।

ऐसी अनमोल ज्ञान को पाने का, विकसित करने का प्रमुख स्त्रोत है “संस्कार शाला धार्मिक पाठशाला”।

विनम्र अनुरोध है कि बच्चों के जीवन का मार्ग प्रशस्त करने वाली ऐसी शालाओं में बाल्यवय से ही बच्चों को भेजेंऔर साथ ही  इन शालाओं में कट्टरवाद को तनिक भी बढ़ावा ना मिले इसका विशेष ध्यान रखें।

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3 COMMENTS

  1. EVERY CITY TOWN VILLEJ SHOULD RUN संस्कार शाला IN MANDIR FOR SHORT PERIOD IN CHAATURMAAS /HOLIDAYS

  2. indore I Shikhardhwaj
    Yes, its an eye opener, we have to think seriously, and take care of our kids . we have to send them on a regular basis to attend Dharmik Pathshala.

    jayesh kothari
    7049913003

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