पापों से सावधान – देखो हम नरक में क्यों गए ?

जानिए 6 प्रसिद्ध चरित्रों के नरक गति बंध को

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अपने अपने कर्मो का फल सभी को भोगना ही पड़ता है चाहे वो भगवान का जीव हो या फिर भगवान का सबसे बड़ा भक्त, कर्म जब तक खप ना जाए तब तक उदय में आते रहते है और आत्मा को चार गतियों मे घूमाते रहते हैं |

आज हम जानेंगे निम्न 6 चरित्रो को जिन्होंने नरक की वेदना सही या सह रहे हैं –

  • त्रिप्रस्ठ वासुदेव
  • श्रेणिक राजा
  • सुभूम चक्रवर्ती
  • कोणिक राजा
  • ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती
  • कमठ

त्रिप्रस्ठ वासुदेव

महावीर प्रभु का 18वा भव था त्रिप्रस्ठ वासुदेव का उनको संगीत सुनने का बहुत ही शोक था पर जब वो सो जाते थे तब शैय्या पालक उस संगीत को बंद कर देता था पर एक दिन कुछ अलग ही हुआ जब त्रिप्रस्ठ वासुदेव संगीत सुन रहे थे तब उनको संगीत सुनते सुनते ही नींद आ गयी और शैय्या पालक को बोला भी की मे जब सो जाउ तो यह संगीत बंद हो जाना चाहिए पर हुआ ही कुछ अलग जो वासुदेव ने कहा था वो शैया पालक नही सुन पाए और वो उस संगीत के मीठी धुन मे सो गये जब वासुदेव जाग कर उठे तब भी संगीत बज ही रहा था तब वासुदेव को गुस्सा आया और सिपाहियों को आदेश किया की शैय्या पालक को लेकर आओ और जब शैय्या पालक हाजिर हुआ तब उसके कान मे गरमा गरम शीशा डाला और वासुदेव बोले की बहुत शौक हे ना तुझे संगीत सुनने का अब सुन, वो शैय्या पालक वही तड़पते हुए मर गया और उसका अगला भव एक ग्वाले की योनि मे हुआ और उस ग्वाले के भाव मे ग्वाले ने प्रभु के कान मे खिल्ले ठोक दिए ! 18 वे भव मे वासुदेव मरकर नरक मे गये |

मगध सम्राट श्रेणिक राजा

एक बार श्रेणिक राजा जंगल मे शिकार करने हेतु निकले, उन्होने एक हिरण देखा और उस हिरण पर बाण चलाया उस हिरण के पेट मे एक बच्चा भी था और जब श्रेणिक राजा ने हिरण को बाण मारा तब वो बहुत खुश हो गये और अहम मे बोलने लगे की “देखा ऐसा होता है शिकार एक तीर से दो जीवों को मार दिया” और उनको इस पाप का फल भी चुकाना पड़ा |

संस्कृत की एक युक्ति हे

“कृतम कर्म आवश्यामेव भोक्तव्यं , कलपकोति शताइरपी”
अर्थात:- करोड़ो साल भी बीत जाए तो भी किए हुए कर्मो की सज़ा तो अवश्य भुगतनी ही पड़ती हे.

ऐसा स्वीकार कर श्रेणिक राजा प्रथम नरक मे गये और भावी चोबीसी मे भरत क्षेत्र मे प्रथम तीर्थंकर बनेंगे |

सुभूम चक्रवर्ती

सुभूम चक्रवर्ती के पिता को परशुराम ने मार कर उनका राज्य लूट लिया और फिर सुभूम और उसकी माता एक गुफा मे रहने लगे, एक दिन सुभूम ने अपनी माँ से पूछा की धरती सिर्फ़ इतनी ही है ? तब उसकी माँ ने कहा की बेटा धरती विशालकाय हे और उसके बाद पूरी कहानी सुनाई और वो सुन कर सुभूम का खून गर्म हो गया और माँ का आशीर्वाद लेकर मेघनाथ विधयाधर के साथ वो हस्तिनापुर गया पहेले वो दानशाला मे गया उसकी नज़र पड़ते ही सिंहासन पर रखी हुई सब दाढ पिघल के खीर बन गयी और वो उसे पी गया यह समाचार सुनते ही परशुराम उस पर हमला करने हेतु आए की सुभूम ने तुरंत ही उसके हाथ मे जो थाल था उसको घुमाया और वो थाल हज़ारों देव द्वारा अधीस्थित चर्क मे परिवर्तित हो गया परशुराम वही मरगया और देव ने सुभूम पर पुष्प वृष्टि की सुभूम 6 खंड का स्वामी था पर बहुत लालची था उसने और ज़्यादा खंड जीतने का लालच रखा और अंत मे वो मर के 7वी नरक मे गया |

कोणिक राजा

कोणिक राजा श्रेणिक राजा का पुत्रा था, जैस श्रेणिक ने बोया वैसा ही पाया | मतलब जो श्रेणिक ने सब के साथ किया
वो ही उसके बेटे ने उसके साथ किया, श्रेणिक राजा का राज्य छीन कर उसे बंदी बना लिया और कारागार मे डाल दिया
वहाँ उसे रोज़ के 100 कोडे मारने मे आते थे वो भी नमक वाले पानी के और बिना कुछ पहने हुए
कोणिक की रोज की जब सज़ा पूरी होती थी तब श्रेणिक राजा की पत्नी उसके लिए उड़द के लड्डू लाती थी और अपना बाल का अंबोडा भीगा कर आती थी जब वो लड्डू खा लेते थे फिर उसकी पत्नी के बाल से पानी पीते थे
कैसी वेदना ? इस तरह ज़ुल्म करने से कोणिक भी नर्क गति मे गया |

ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती

ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती ने कितने ब्रहमीनो की आँखे फोड़ कर हर सुबह उन आँखो को मसलने का ही काम किया था और निर्बरहमी पृथ्वी करने की हिंसा की उसी हिंसा करने का पाप उसको 7वी नरक मे लेके गया

कमठ

कमठ ने प्रथम भव मे वैर वेमनस्या का नियाना बाँध के अपने ही सगे भाई मरुभूति को मार दिया और भविष्य मे भी मारता रहूँगा ऐसे नियना वृति से मनुष्य हत्या और मुनि हत्या का पाप करके कितनी बार नरक मे गया |

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